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ये मन बंजारा रे - गीता गैरोला

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"ये मन बंजारा रे" गीता गैरोला द्वारा लिखित एक दिल को छू लेने वाला उपन्यास है, जो पहाड़ी समाज के संघर्ष, जीवन और पहचान की भावनाओं को बहुत ही संवेदनशील तरीके से व्यक्त करता है। लेखिका लिखती हैं यात्राएं हमेशा मानसिक संपन्नता का सोपान होती हैं। यात्राओं में सैंकड़ों लोग मिलते हैं, उनकी कहानी सुनाई देती हैं, लोगों की जिंदगियों की सच्ची तस्वीर मालूम होती है। सुख-दुख की परतें बिखरती हैं, हम अपनी आंखों से देखें, कानों से सुनें दुख सुखों को अपनी झोली में भर कर आगे चल पड़ते हैं। पहाड़ों की उन संकरी उबड़-खाबड़ पगडंडियों पर जो कभी बहुत पास लगती हैं, कभी किसी मोड़ के बाद ओझल हो जाती हैं, कभी दूर चलती दिखाई देती हैं। यात्राओं ने मुझे हमेशा आगे बढ़ाया, रास्ता दिखाया और रास्ता बनाया भी। मुझे यात्राएं हमेशा किताबों की तरह लगती रही हैं।  यह किताब पहाड़ों के आत्मीय रिश्तों, पर्यावरण, और वहां के लोगों के जीवन की सच्चाइयों पर आधारित है। "यह मन बंजारा रे" का मुख्य विषय पहाड़ का जीवन और उसमें समाहित प्रेम, दर्द और संघर्ष है। यह एक तरह से आत्मीय खोज का सफर है, जिसमें पात्र अपन...

नए रास्तों पर

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"रास्ते हमेशा मेरी आत्मा को आवाज़ देते हैं, और पहाड़ों की बुलाहट मुझे कहीं न कहीं अपने भीतर के खोए हुए हिस्से से मिलवाती है। घुमक्कड़ी का हर कदम नए रहस्यों और अनदेखे दृश्यों की ओर ले जाता है, जहां हर मोड़ पर एक नया सवाल, एक नई खोज होती है। पहाड़ों की ऊँचाइयाँ न केवल शारीरिक यात्रा का अनुभव कराती हैं, बल्कि यह हमारे भीतर की अनजानी ऊँचाइयों तक पहुँचने का भी आह्वान करती हैं। इन अनमोल रास्तों पर चलते हुए, मन में एक अजीब सा ख्याल उभरता है- क्या हम जो देख रहे हैं, वही हम हैं, या फिर हर कदम हमें अपने असल रूप से और करीब ले आता है?" अंत में: "अब, जब इस यात्रा के अंत को देखता हूँ, तो महसूस होता है कि यात्रा कभी समाप्त नहीं होती। हम केवल नए रास्तों पर चलते हैं, लेकिन वही रास्ते हमें खुद के भीतर की गहराई से मिलवाते हैं। हर पहाड़, हर मोड़, और हर कदम ने मुझे अपनी असल पहचान से परिचित कराया। यह यात्रा भौतिक दुनिया की सीमाओं से परे थी; यह एक आंतरिक यात्रा थी, जिसमें मैं स्वयं को नए दृष्टिकोण से समझने की कोशिश करता रहा। जब भी रास्ते खत्म होते हैं, एक नई शुरुआत इंतजार करती है -...

"देवभूमि डेवलपर्स" किताब की समीक्षा :

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 "देवभूमि डेवलपर्स" नवीन जोशी जी द्वारा रचित एक ऐसा उपन्यास है, जो उत्तराखंड के पहाड़ी समाज की बदलती परिस्थितियों, राजनीतिक संघर्षों और तथाकथित विकास त्रासदी को बेहद संवेदनशील और गहराई से उजागर करता है। यह किताब सिर्फ एक कहानी नहीं है बल्कि, पिछले कुछ दशकों में पहाड़ की पीड़ा, विस्थापन और जन आंदोलनों की महागाथा है। इसमें टिहरी बांध के निर्माण के कारण जलमग्न हुए गांवों, पहाड़ों की खाली होती बस्तियों और पलायन जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया गया है। यह किताब उत्तराखंड राज्य निर्माण की पृष्ठभूमि से लेकर आज तक के विडम्बना पूर्ण विकास की तस्वीर खींचती है। उपन्यास के कथानक पहाड़ों के उस समाज को चित्रित करता है, जहां प्राकृतिक संसाधनों की लूट और राजनीतिक स्वार्थों ने लोगों के जीवन को गहरे स्तर पर प्रभावित किया है। उपन्यास के पात्र न सिर्फ अपनी व्यक्तिगत पीड़ाओं से जूझते हैं, बल्कि वह पूरे पहाड़ी समाज की सामूहिक वेदना को भी व्यक्त करते हैं। उपन्यास उत्तराखंड के "नशा नहीं रोजगार दो" आंदोलन, टिहरी बांध के विस्थापन और खटीमा-मसूरी जैसे ऐतिहासिक घटनाक्रमों का सजीव व...

चिपको आंदोलन

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आंदोलन: 1964 में पर्यावरणविद् और गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता चंडी प्रसाद भट्ट ने स्थानीय संसाधनों का उपयोग करके ग्रामीण ग्रामीणों के लिए छोटे उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए एक सहकारी संगठन, दशोली ग्राम स्वराज्य संघ (बाद में इसका नाम बदलकर दशोली ग्राम स्वराज्य मंडल [डीजीएसएम]) की स्थापना की। जब औद्योगिक कटाई को 1970 में क्षेत्र में 200 से अधिक लोगों की जान लेने वाली भीषण मानसूनी बाढ़ से जोड़ा गया, तो डीजीएसएम बड़े पैमाने के उद्योग के खिलाफ विरोध की ताकत बन गया। चिपको आंदोलन की पहली लड़ाई 1973 की शुरुआत में उत्तराखंड के चमोली जिले में हुई। यहां भट्ट और दशोली ग्राम स्वराज्य मंडल (डीजीएसएम) के नेतृत्व में ग्रामीणों ने इलाहाबाद स्थित स्पोर्ट्स गुड्स कंपनी साइमंड्स को 14 ऐश के पेड़ काटने से रोका। यह कार्य 24 अप्रैल को हुआ और दिसंबर में ग्रामीणों ने गोपेश्वर से लगभग 60 किलोमीटर दूर फाटा-रामपुर के जंगलों में साइमंड्स के एजेंटों को फिर से पेड़ों को काटने से रोक दिया। । ग्रामीणों को कृषि उपकरण बनाने के लिए कम संख्या में पेड़ों तक पहुंच से वंचित कर दिया गया था, जब सरकार ने बहुत बड़ा ...

बसंत पंचमी और बसंत ऋतु का स्वागत:

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जो ल्यौ पंचनाम देवता जो ल्यौ पंचमी का सालै जो ल्यौ हरि, ब्रह्मा, शिव जो ल्यौ मोरी का नारैण जो ल्यौ खोली का गणेश जो ल्यौ बारा मैनों की जसना जो ल्यौ भूमि का भूम्याल।  बसंत पंचमी और बसंत ऋतु की शुभकामनाएं। आप सबको पता है कि हमारे देश में माघ, फागुण, चैत में बसंत ऋतु का आगमन होता है। इस समय डांड्यों में सुंदर-सुंदर फूल खिलते हैं। पेड़ों में नई-नई कोंपल आती है और चारों तरफ हरियाली ही हरियाली हो जाती है। हमारे उत्तराखंड की डांडे भी अयांर, पय्यां, मेलू, ग्वीराल, फ्यूली के फूलों से लकदक हो जाती है और खेत सरसों के फूलों से सज जाते हैं। (बसंत बौड़ीन झूमैलो)। ( ग्वीराल फूल फुलिगे म्यारा भीना । मालू बेड़ा फ्योलड़ी फूलिगे भीना। भीना । झपन्याली सकिनी फुलिगे घरसारी लयड़ी फुलिगे भीना । डाँड्यूँ फुलिगे बुरांस म्यारा भीना ।  डल फूलो बसन्त बौड़िगे भीना। बसन्त रंग माँ रंगै दै--भीना।  ग्वीराल फुलिगे म्यारा भीना)। माघ माह में पूरे उत्तराखंड में बसंत पंचमी मनाने की परंपरा है। इस समय खेतों में जौ, गेहूं की हरियाली हर तरफ बिखर जाती है और और पीले सरसों खेत में ऐसे खेले रहते हैं जैसे कि...