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मकरैण, उतरैण या घी संगरांद:

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सूर्य के मकर राशि में प्रवेश का दिन मकर संक्रान्ति कहलाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य को आत्मा का कारक माना जाता। है। संक्रान्ति का अर्थ संक्रमण से भी है, सूर्य एक माह तक राशि में रहता है और माना जाता है कि सूर्य के मकर राशि में होने से मृत्यू को प्राप्त व्यक्ति की आत्मा मोक्ष को प्राप्त होती है। व्यक्ति की कुण्डली में सूर्य लग्न नवम व दशम का नैसर्गिक कारक होता है। यह आरोग्य, साहस, धर्म-कर्म, नेतृत्व, पैतृक संपति, पिता सुख आदि को प्रभावित करने वाला प्रमुख ग्रह है। शास्त्रों के अनुसार मकर संक्रान्ति के दिन सूर्य देवता धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं जबकि मकर राशि के स्वामी शनि देव हैं। शनि सूर्य के पुत्र हैं मगर अपने पिता से उनका बैर है, शनि के घर में सूर्य के प्रवेश करने पर शनि कष्ट न दे, नुकसान न पहुँचाये इसलिए इस दिन को जप, तप, व दान के लिये उत्तम माना जाता ना है। गढ़वाल में यह दिन मकरैण या खिचड़ी संगरांद के रूप में जाना व मनाया जाता है(उतरायणीं, मकरैणी, घुघुतिया, पुस्योड़िया, मकरैण, उतरैणी, उतरैण, घोल्डा, घ्वौंला, चुन्यात्यार, खिचड़ीयासंग्रांत), क...

उत्तराखण्ड का काला दिन रामपुर तिराहा कांड 2 अक्तूबर:

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उत्तराखंड -दो अक्टूबर मुजफ्फरनगर नगर गोली कांड में शहीद आंदोलन कारी को शत् शत् नमन करते हुए श्रद्धांजलि। रामपुर तिराहा फायरिंग मामला 2 अक्टूबर, 1994 की रात को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के रामपुर तिराहा में निहत्थे उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों पर पुलिस गोलीबारी से संबंधित है। इस भयावह घटना को सहने वाले तमाम लोग व उनके परिवारजन आज भी याद करके दहल व सहम जाते हैं। सन 1994मे दो अक्टूबर को उत्तराखंड के कुमाऊं व गढ़वाल के पर्वतीय क्षेत्रों के लोगों ने दिल्ली जंतर-मंतर में उत्तराखंड प्रथक राज्य के लिए मांग की। लेकिन सन 1994 मे यूपी तत्कालीन सरकार के शासन प्रशासन ने उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों के लोगों को एक अक्टूबर की रात में ही रामपुर तिराहा में रोकर बसों के शीशे तोड़कर बिना बताए पुलिस के द्वारा व शादी वर्दी के लोगों के द्वारा लाठी चार्ज व फायरिंग व पत्थर बाजी करके महिलाओ के साथ अभद्रता व्यवहार व फायरिंग करके बसों को रोकर हजारों की संख्या जा रहे आन्दोलन कारियों को रोक दिया। यहां तक पुलिस के द्वारा फायरिंग में 7लोग शहीद भी हुए। तत्कालीन यूपी सरकार ने उत्तराखंड प्रथक राज्य...

मन बंजारा रे:

“नंदा देवी नाम की एक लड़की की कहानी”

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1976 में महान पर्वतारोही विल्ली अनसोएल्ड की बेटी, नंदा देवी अनसोएल्ड, उस विशाल भारतीय पर्वत पर चढ़ाई करते हुए मृत्यु को प्राप्त हुईं, जिसके नाम पर उनका नाम रखा गया था। दशकों बाद, मित्र, परिवार और उस अभियान के बचे हुए सदस्य इस विवादास्पद साहसिक यात्रा के दौरान क्या गलत हुआ, इस पर प्रकाश डालते हैं और एक रहस्यमयी युवती के जीवन की झलक देते हैं, जिसने सीमाओं के बिना जीवन जिया। जब विल्ली अनसोएल्ड ने पहली बार हिमालय की उस चोटी को देखा जिसे नंदा देवी कहा जाता है, तब तक वे अमेरिका के महान पर्वतारोही नहीं बने थे। स्थानीय लोग इसे आनंद देने वाली देवी का पर्वत मानते हैं। यह 25,645 फुट ऊँचा है और भारत के उत्तर-पूर्वी कोने में, नेपाल की सीमा के पास, छोटे-छोटे शिखरों की एक घेराबंदी से घिरा हुआ है। नंदा देवी के चरणों तक पहुँचना भी कठिन है — पहले ऋषि गंगा नदी की गहरी घाटी से ऊपर चढ़ना पड़ता है और फिर 14,000 फुट की ऊँचाई पर खतरनाक भूभाग से होकर गुजरना पड़ता है। हालाँकि उस समय दूर से शिखर को निहारते हुए अनसोएल्ड इन बाधाओं को देख नहीं पा रहे थे, परंतु अपनी पूरी ज़िंदगी वे उस क्षण की सोच को याद करते रहे: “म...

"हिमवंत"कवि चंद्रकुंवर बर्तवाल

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चन्द्र कुंवर बर्त्वाल जी का जन्म 20 अगस्त 1919 को उत्तराखण्ड के चमोली (अब रुद्रप्रयाग जिले में )जिले के ग्राम मालकोटी, पट्टी तल्ला नागपुर में हुआ था। शिक्षा पौड़ी,  देहरादून और प्रयाग में हुई।इनके पिता का नाम श्री भूपाल सिंह बर्त्वाल और माता का नाम श्रीमती जानकी देवी था। सन् 1939 में इन्होंने इलाहाबाद से बी. ए. की परिक्षा उत्तीर्ण सन् 1941 में एम. ए. कक्षा में लखनऊ में प्रवेश लिया। क्षय रोग के कारण घर वापस - पंवालिया आ गए। आठ साल पंवालिया और अगस्तमुनि में बीते । अगस्तमुनि में हेडमास्टर बने लेकिन फिर छोड़ दिया। आधुनिक काल के कवि। प्रमुख कृति गीत- माधवी कविता संग्रह। उन्होंने मात्र 28 साल की उम्र में हिंदी साहित्य को अनमोल कविताओं का समृद्ध खजाना दे दिया था।  सरस्वती के वरद पुत्र 'काफल पाक्कू' के अमर गायक, चन्द्रकुँवर बर्त्वाल ने अपनी कालजयी कविताओं में हिमालय का ज्वलन्त जीवन रूप साकार किया है। हिमपण्डित शैल-शिखर, सदानीरा कल-कल करती नदियाँ, लम्बे-चौड़े लहलहाते चरागाह, दूर-दूर तक फैले चीड़, बाँज, बुराँश, देवदार के घने घने जंगल, रंग-बिरंगे फूलों से लदालद भरी घाटिय...

श्री देव सुमन जी की पुण्यतिथि पर:

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84 दिन लंबी भूख हड़ताल के शहीद श्री देव सुमन का जन्म उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले के बमुंड पट्टी के ग्राम जौल में 25 मई 1915 को हुआ था। इनके पिता का नाम हरिराम बडोनी और माता का नाम श्रीमती तारा देवी था मात्र तीन वर्ष की छोटी सी उम्र में उनके सर से पिता का साया उठ गया। इन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही विद्यालय से की और टिहरी से मिडिल पास किया। 1930 में सुमन जी ने मात्र 14 वर्ष की उम्र में "नमक सत्याग्रह" आंदोलन में भाग लेकर साबित कर दिया था कि उनके अंदर देश प्रेम की भावना किस हद तक भरी हुई थी। 1932 में देहरादून में वह अध्यापक बने। "सुमन गौरव" एक राष्ट्रीय कविता संग्रह प्रकाशित किया। साप्ताहिक हिंदू समाचार पत्र का संपादन शुरू किया। 1937 में शिमला हिंदी साहित्य सम्मेलन के कार्यकारी अध्यक्ष निर्वाचित हुए। 1938 में जवाहर लाल नेहरू पौड़ी आए। उनकी सभा में सुमन जी ने दोनों टिहरी गढ़वाल और पौड़ी गढ़वाल दोनों की अखंडता पर जोर दिया। 1939 में टिहरी रियासत में प्रजामंडल (रियासतों में कांग्रेस, प्रजामंडल के नाम से सक्रिय थी) की स्थापना के बाद सक्रिय सदस्य ब...

नरेंद्र सिंह नेगी जी के कुछ चुने हुए गीत।

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बद्री केदारनाथ गीत जो की घर जवें फ़िल्म में से है- जय बद्री केदारनाथ -2 गंगोत्री जय जय, जमुनोत्री जय जय -2 हे बाबा केदार तेरो  जन ऊंचो स्थान, हो... तन ऊंचों राखी, ये देश कू मान,  जुग जुग बटीं य दुनिया रे बाबा  त्यारा  दर्शनू कू आणीं छा दुःख विपदा ते मां छोड़ी की सुख उखड़ी ली जाणीं छा  हे बाबा, सुख उखड़ी ली जाणीं छा  हे शंभू  जो जस दे भगवान  जो जस दे भगवान  अखण्ड त्येरी ज्योत जाणीं बद्री विशाला तने रखी अखंड ये मुलुक ये हिमाला हरिजनू को भेद भाव ना  ठाकुर   Thakur baahman jaat paat Aas aulaad aur des ka khatir Hita bhai behno saath saath Hita bhai behno saath saath Hey Naarain, sabhi teri chaa santaan Sabhi teri chan santaan Jai badri kedarnath Gangotri Jai jai Jamunotri jai jai ————————————————– अपड़ी तों सरम्येली आंख्युं, अपड़ी तों सरम्येली आंख्युं, अपड़ी तों सरम्येली आंख्युं देखण दया जरा इना ता देखा देखण दया जरा इना ता देखा तुमारी समणी सरम च आणि,हम्तै भारी सरम च आणि पैली तुम जरा उना ता देखा, हो पैली तुम जरा उन ता देखा ...