ब्रह्मकमल

वर्ष में ज्यादातर समय बर्फ से ढके हिमालय की छटा वर्षा ऋतु के दौरान भी निराली ही होती है। इससे पूर्व जून तक के महीने में सूर्य की तीखी किरणें हिमालय पर जमी बर्फ को शायद ही विचलित कर पाती हों, लेकिन मानसून के आने के साथ ही प्रकृति अपना रंग दिखाने लगती है और चारों ओर होती है जड़ी - बूटियों, फूल- पत्तियों की बहार ही बहार। इस मनमोहक हरियाली के बीच होती है प्रकृति रूपी चित्रकार की एक अनूठी रचना "ब्रह्मकमल" जिसका जीवन सिर्फ 3 महीने का होता है।

      हिमालय की वादियों में खिलने वाले विभिन्न किस्मों के फूलों - रत्नज्योति, गुलमेहंदी, लिली, पीले मार्श, मेरीगोल्ड, पोटेण्टिला, रेनन्कुलस में बड़े आकार वाला क्रीम रंग की पंखुड़ियों का फूल ब्रह्मकमल अनूठा ही है। हालांकि इस फूल का कमल की जाति से कोई संबंध नहीं है। 

       ब्रह्मकमल पत्थरों एवं चट्टानों की आड़ में उस जगह खिलता है जहां की बर्फ कभी नहीं पिघलती। इसकी गंध बहुत तीव्र होती है। हिमालय की घाटियों व चोटियों में  बसे उत्तराखंड वासी इसे बहुत पवित्र मानते हैं और उनकी पूजा-अर्चना में इसका विशेष महत्व है। 

       इससे एक पौराणिक कथा भी जुड़ी है। कहा जाता है पांडव अज्ञातवास के दौरान गढ़वाल स्थित पांडुकेश्वर में रुके थे। पांडुकेश्वर के निकट अलकनंदा और पुष्पावती के संगम पर जब द्रोपदी स्नान कर रही थी, तो उनकी नजरें ऐसे मनमोहक पुष्प पर पड़ी, जो तेज धारा में बहता हुआ उनकी आंखों से ओझल हो गया। उन्होंने भीम से उस पुष्प को ढूंढ लाने का आग्रह किया। भीम उसे ढूंढते-ढूंढते फूलों की घाटी तक जा पहुंचे और वहीं से इसे लाए। यही पुष्प ब्रह्मकमल था। तत्पश्चात द्रोपदी  ने इससे भगवान की पूजा की।

        ब्रह्मकमल पवित्र होने के साथ-साथ सौभाग्यदायक माना जाता है। इसके अलावा इसके पीछे एक अन्य कथा यह भी प्रचलित है कि देवी-देवताओं के आदि निवास हिमालय क्षेत्र में ब्रह्माजी ने इस फूल की रचना की थी। नंदा अष्टमी के दिन गढ़वाल के शिवालयों व देवालयों में भव्य पुष्प पर्व मनाया जाता है व विशेष प्रसाद के रूप में ब्रह्म कमल बांटे जाते हैं।

        ब्रह्मकमल गढ़वाल के पंच केदार क्षेत्र में सर्वाधिक पैदा होता है। नंदीकुंड, कागभुषण्डि, सतओपंथ, स्वर्गारोहिणी झील, केदारनाथ, खिरों घाटी, देवस्थलों पर यह बहुत ज्यादा मात्रा में होते हैं।

        इन क्षेत्रों में जाने वाले पर्यटक ब्रह्मकमल को जड़ सहित तोड़कर ले जाते हैं, जिससे इस पुष्प की प्रजाति खत्म होती जा रही है। शोधकर्ता भी इसके विनाश में जुटे हुए हैं। यदि शीघ्र ही इसके संरक्षण के लिए कदम नहीं उठाए गए, तो जल्द ही यह पुष्प सिर्फ पौराणिक कथाओं में ही शेष रह जाएगा। 

प्रकाश पुरोहित "जयदीप" ।

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